भारत में रामलीला का मंचन अक्टूबर के महीने में होता है और दीपावली से ठीक 20 दिन पहले दशहरे पर रावण वध और फिर अगले दिन राजा राम के राजतिलक के दृश्य के साथ समापन होता है. दशकों से इस सिलसिले को देखते हुए बड़े हुए किसी भी व्यक्ति को अगर कोई मार्च के महीने में राम लीला मंचन होने की बात कहे तो अटपटा तो लगेगा ही. ऐसा ही अपने साथ हुआ . पहले पहल तो इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ. फिर लगा कि शायद उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ऐसा होता होगा लेकिन जब कुछ अन्य लोगों से इस बारे में पूछताछ की तो हैरानी ज्यादा हो गई . पता चला कि यहां पाटा गांव के अलावा ऐसा कहीं और नहीं होता. लेकिन इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था कि पाटा गांव में ही ऐसा क्यों ? परम्परा और पौराणिक तर्क से हटकर 6 महीने पहले ही भला क्यों उत्तराखंड के इसी गांव में इन दिनों में रामलीला होती है ? वो भी रात के वक्त नहीं बल्कि दिन में…!
कौतुहल और जिज्ञासा शांत करने के लिए पाटा जाकर असलियत देखना ज़रूरी था. नथुआखान से करीब 6-7 किलोमीटर दूर पहाड़ी गांवों , जंगलों , नदी व घाटी के रास्ते पार करते पाटा गांव तक पहुंचना थकान भरा था . दो घंटे का यह सफर या कहें कि ट्रैक रोमांचक भी उतना ही था. बीच बीच में बुरांश के लाल गुच्छेदार सुन्दर फूलों से लदे पेड़ खूब आकर्षित करते रहे. कुछ क्षणों के लिए इनके पास रुकने और फोटो खिंचवाने का भी मौका मिला जाता . तरह तरह के रंग बिरंगे पक्षी और उनकी तरह तरह की संगीत भरी चहचहाहट आनंदित कर देती. जैसे जैसे पाटा करीब आता जाता वैसे वैसे वैसे राम लीला के स्टेज से आने वाली आवाज़ पहाड़ों में गूंजते हुए हमारे कानों में तेज़ी से पड़ने लगी . सामने पहाड़ पर दूर से ही गुलाबी सफ़ेद कपड़ों से बना पंडाल दिखाई दे रहा था जो आम तौर पर शादी जैसे समारोहों के लिए बनाया जाता है. करीब जाने पर आस पास स्नैक्स और खाने पीने के सामान की कुछ अस्थाई दुकानें दिखीं जो मेले जैसा माहौल का अहसास करवा रही थीं. सब तरफ से रंगीन कनातों से घिरा पंडाल पहाड़ पर एक औसत दर्जे के टेंट जैसा लगा लेकिन भीतर पहुँचते ही मंजर उम्मीद से बिलकुल अलग दिखा.
रामलीला मंचन देखने के लिए यहां आने वाले दर्शकों के लिए यह एक विशाल पंडाल था. स्टेज तक जाने के रास्ते में बीचो बीच रेड कारपेट बिछा था जिसके दाईं तरफ महिलाओं के और बायीं तरफ पुरुषों के बैठने का इंतजाम था . एक सिरे से दूसरे सिरे तक ज़मीन पर कारपेट फैला था और कुछ कुर्सियां भी थी . अलग अलग उम्र के सैंकड़ों दर्शक बैठे थे और अभी भी इतनी जगह बची थी कि दो चार सौ और भी बैठ सकें. औसत दर्जे का छोटा सा स्टेज . बैकग्राउंड म्यूजिक के देने के लिए लाइव व्यवस्था रखी गई थी और संगीतकार वाद्य यंत्रों के साथ स्टेज के ही एक तरफ थे . विशेष आमंत्रित लोगों के लिए यहां बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियों का बन्दोबस्त था . कुल मिलाकर यह बंदोबस्त ऐसे स्थान पर अपेक्षा से बेहतर ही कहा जाएगा जहां पहुंचने के लिए ठीक से सड़क भी नहीं बनी . कुमाऊंनी व हिंदी मिश्रित मंच संचालन और जोकर बने कलाकार अपनी बातों से दर्शकों को हंसा रहे थे. छल से राम लक्ष्मण का अहिरावण द्वारा अपहरण करने से लेकर राम रावण तक के अंतिम युद्ध तक वैसे ही दृश्य थे जैसे कहीं भी उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की रामलीला के मंच पर दिखाई देते हैं . वो बात अलग है कि रावण व उसके योद्धा राक्षसों को कुछ भयानक दिखाने के लिए किए गए मेकअप में काले शीशे वाले गोगल्स पहना दिए गए थे.
स्टेज पर परफॉर्म कर रहे कुछ कलाकारों का अभिनय भी प्रभावशाली था लेकिन डायलाग वो न तो याद करके आए थे , न ही पर्दे के पीछे से कोई प्रांप्ट कर रहा था. नोट्स के तौर पर कागज़ पर लिखे डायलाग वह हाथ में दबाए रुमाल जैसे कपडे में रखे रहते थे . एक बारगी यह अजीब लग सकता है लेकिन यहां यह तरीका अपनाया जाता है जो शायद स्वीकार्य भी है. वैसे भी यह कोई पेशेवर आर्टिस्ट नहीं थे. आयोजकों का कहना है कि यहां सारा इंतजाम स्थानीय निवासी करते हैं . अभिनय करने वाले , उनका मेकअप , ड्रेस डिजाइन , डायलॉग लिखने से लेकर संगीत तक देने वाले स्थानीय ग्रामीण हैं . यह सच में इस आयोजन का रोचक पहलू है जो आत्मनिर्भरता के लिहाज़ से अपने आप में प्रेरणादायक भी है .
खैर, पाटा गांव में राम लीला देखने के अलावा एक इरादा अपने उन सवालों के जवाब खोजना भी था जो मार्च – अप्रैल के महीने में इसके आयोजन के राज़ से जुड़े थे .पहले तो यही तथ्य जानकार झटका लगा कि इन दिनों में यहां पर रामलीला आयोजन की कोई पुरानी परम्परा नहीं है. न ही ऐसा कहीं आसपास देखा सुना जाता है . शारदीय नवरात्रि की बजाय चैत्र नवरात्र में रामलीला का मंचन दरअसल यहां के लोगों की व्यावहारिकता , भौगोलिक परिस्थितियों और राम जन्म की पौराणिक कथा से जुडा है. इस मान्यता के मुताबिक़ राम का जन्म चैत्र महीने के नवरात्रि के आखरी दिन हुआ था. नैनीताल जिले के इस गांव में लीला मंचन देखने के लिए लोग आसपास की पंचायतों के गांवों से भी आते हैं . क्योंकि दूरदराज़ से पैदल आना होता है और शाम को अंधेरा होने के बाद यहां से लौटने के लिए न तो कोई वाहन उपलब्ध होता है और उस पर जंगली जानवर , विशेषकर तेंदुए , का भय बना रहता है इसलिए कुछ ग्रामीण तो रात यहीं बिताने तक का प्लान बना लेते हैं . नथुआ खान पंचायत के म्यौडा गांव से रामलीला देखने आई एक महिला ने यह बताया.

वैसे पाटा गांव नैनीताल की उस सतबुंगा पंचायत के तहत है जिसमें 8 -10 किलोमीटर के आसपास का क्षेत्र है. इसके सभी गांवों की आबादी कुल मिलाकर 10 हज़ार के आसपास होगी. सतबुंगा पंचायत के प्रधान जीवन गौड़ ने बताया कि पाटा में मार्च के महीने में दिन में राम लीला मंचन की शुरुआत पिछले साल यानि 2024 के चैत्र नवरात्रि के मौके पर हुई थी. लेकिन पहली बार में ही इसकी इतनी लोकप्रियता हो गई कि इस बार काफी लोग आ गए और वह भी दूर दराज़ के गांवों से भी . श्री गौड़ कहते हैं कि इन दिनों में एक तो मौसम बेहतर होता है . ख़ास तौर पर दिन सुहावना होता है. खेतों में बहुत सी सब्जी के बीज बोये जा चुके या पौधे रोपे जा चुके होते हैं. किसी तरह की फसल कटाई , फलों की तुड़ाई या ऐसे बहुत से काम न होने के कारण ग्रामीणों पर अन्य दिनों की अपेक्षाकृत काम का दबाव कम होता है. श्री गौड़ कहते हैं कि इन तमाम कामों में ज़्यादातर भूमिका मातृशक्ति (महिलाओं ) की रहती है इसलिए आजकल वे भी थोडा ‘ फ्री ‘ होती हैं . बच्चों के स्कूल के इम्तिहान हो चुके होते है और कइयों के नतीजे भी निकल चुके होते हैं . इन तमाम हालात के कारण सबका इस तरह के सामूहिक कार्यक्रमों में शामिल होना और उनका आनन्द लेना संभव हो पाता है . दिन में करने का एक कारण यह भी है ताकि दूर के इलाकों से आने वाले भी लीला देखकर अपने ठिकाने पर सुरक्षित लौट सकें.

दिन में इस आयोजन करके एक लाभ यह भी है कि बिजली का खर्च भी बचता है और उसके सप्लाई रुकने पर पैदा होने वाली रुकावट का भी डर नहीं . यूं भी यहां सूर्य ढलने से पहले ही सर्दी हो जाती है. श्री गौड़ कहते हैं कि शारदीय नवरात्रि में आसपास के कई गांवों में राम लीला होती हैं लेकिन हम लोग यहां कुछ अलग हट कर भी करना चाहते थे. इन्हीं बातों व तर्कों पर विचार करके यहां इन दिनों में राम लीला आयोजित करने की योजना बनी . वैसे पाटा गांव में होली , शिवरात्रि आदि पर विशेष उत्सव के साथ भागवत कथा भी शानदार तरीके से होती है . इन तमाम गतिविधियों को प्रोत्साहित कर रहे जीवन गौड़ ने अपने जीवन का ज्यादातर समय राजधानी दिल्ली में बिताया पढ़ाई से लेकर नौकरी तक वहीं की लेकिन 2016 में ,हमेशा यहां रहने के इरादे से , पुरखों के गांव पाटा लौट आए. यहां प्रधानी का चुनाव लड़ा और इसी पद पर कायम हैं .